सिद्ध पीठ शिव बगलामुखी मंदिर परिचय

जय माँ बगलामुखी 🙏

सिद्ध पीठ शिव बगलामुखी मंदिर, ब्रह्मपुरी, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) दस महाविद्याओं में अष्टम महाविद्या माँ बगलामुखी का परम पावन सिद्ध पीठ है। यहाँ माँ बगलामुखी का स्वयंभू स्वरूप विराजमान है जो सैकड़ों वर्षों से भक्तों को शत्रु-स्तम्भन, वाक्-सिद्धि, मुकदमा विजय, काला जादू निवारण एवं हर प्रकार के संकट से मुक्ति प्रदान कर रहा है।

माँ बगलामुखी पीताम्बरा धारिणी हैं। स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान, दाहिने हाथ में गदा और बाएँ हाथ से दैत्य की जीभ पकड़े हुए, माँ का यह भयंकर रूप अधर्म, असत्य और दुष्टता का तुरंत स्तम्भन कर देता है। माँ का मूल मंत्र है:
ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ॥

1970 के दशक में संतों को स्वप्न दर्शन हुआ और इस पवित्र स्थल पर माँ बगलामुखी ने स्वयं प्रकट होकर दर्शन दिए। तभी से यह स्थान सिद्ध पीठ के रूप में विख्यात है। माँ के साथ भगवान शिव, माँ दुर्गा, हनुमान जी, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, माँ संतोषी, माँ अन्नपूर्णा आदि अनेक देवी-देवताओं के सुंदर विग्रह भी विराजमान हैं।

यहाँ प्रतिदिन प्रातः 5:30 बजे मंगला आरती, दोपहर 12 बजे भोग आरती और सायं 6:30 बजे विश्व प्रसिद्ध संध्या आरती होती है जिसमें सैकड़ों भक्त सम्मिलित होते हैं। नवरात्रि, बगलामुखी जयंती एवं दीपावली पर यहाँ विशाल हवन एवं महोत्सव होते हैं जिनका सीधा प्रसारण यूट्यूब पर भी किया जाता है।

देश-विदेश से आने वाले लाखों भक्तों की मनोकामना माँ बगलामुखी यहाँ शीघ्र पूर्ण करती हैं। माँ के दर्शन मात्र से ही शत्रु भय, मुकदमे का तनाव, व्यापार में रुकावट एवं पारिवारिक क्लेश दूर हो जाते हैं।

श्री बगलामुखी चालीसा | Full Chalisa

रोज पाठ करने से शत्रु स्तम्भन, मुकदमा विजय एवं सर्व कार्य सिद्धि होती है

॥ दोहा ॥
जय जय बगला जय जय काली। जय जय महाकाली महाकाली॥
पीताम्बरा पीतवस्त्र धारी। शत्रु नाशिनी दुष्ट संहारी॥

नमो नमो बगलामुखी माता। सर्व सिद्धि दायिनी जग दाता॥
पीतवर्ण पीताम्बर धारी। स्वर्ण सिंहासन पर विराजे प्यारी॥1॥

दक्षिण काली रूप तुम्हारा। शत्रु स्तम्भिनी महाविहारा॥
खड्ग खप्पर त्रिशूल सुहाया। दुष्ट दलन में सदा सहाया॥2॥

पीत चंदन पीत फूल माला। पीत आसन पीताम्बर वाला॥
पीत रत्न पीत मुकुट सोहे। पीत किरण से विश्व निखरे॥3॥

दानव दल पर गदा प्रहारिणी। शत्रु स्तम्भिनी दुख निवारिणी॥
बगला मंत्र जपे जो कोई। सिद्धि प्राप्ति होय सब कोई॥4॥

जो नर ध्यान तुम्हारा धरे। शत्रु नाश होय सुख सम्पदा बढ़े॥
कष्ट निवारिणी जय हो तुम्हारी। माँ बगलामुखी दया की झारी॥5॥

जो भी माँ का नाम पुकारे। उसका बेड़ा पार उतारे॥
दुख दरिद्रता दूर करे माता। भक्तों की करे सदा सहायता॥6॥

ह्लीं बीज मंत्र तुम्हारा प्यारा। जपे जो कोई होय सुख सारा॥
शत्रु स्तम्भन मुक्ति मिल जाये। बगला कृपा से सब कुछ पाये॥7॥

जो कोई तुमको सुमिरन करे। मनवांछित फल शीघ्र ही धरे॥
नवरात्रि में पूजन करे जो। उसका जीवन सुखमय हो वो॥8॥

म>माँ बगलामुखी तुम्हें प्रणाम। करहु कृपा मुझ पर सदा दाम॥
जय जय बगला जय जय काली। जय जय महाकाली महाकाली॥9॥

॥ दोहा ॥
जो यह चालीसा पढ़े या पढ़वाये। बगलामुखी कृपा से सुख सम्पत्ति पाये॥
शत्रु नाश होय, कार्य सिद्ध होय। माँ बगलामुखी के चरणों में शीश नवाये॥

॥ इति श्री बगलामुखी चालीसा सम्पूर्णम् ॥ जय माँ बगलामुखी !

श्री बगलामुखी आरती | Daily Evening Aarti (6:30 PM)

॥ आरती ॥

ॐ जय बगलामुखी, जय जय बगलामुखी।
पीताम्बर धारिणी, शत्रु स्तम्भिनी माँ बगलामुखी॥

स्वर्ण सिंहासन पर विराजे, पीतवस्त्र सुंदर साजे।
दुष्ट दलन करे सदा माँ, भक्तों के दुख हर साजे॥

खड्ग-खप्पर त्रिशूल धारिणी, दानव दल संहारिणी।
शत्रु की जीभ खींचकर, स्तम्भन करे महारानी॥

पीत चन्दन लेपित काया, पीत पुष्प की माला।
पीत किरणों से जगमग जगमग, माँ की ज्योत निराली॥

हल्दी की माला पहने माँ, हल्दी से सारा आँगन।
भक्तों पर कृपा बरसाओ, दूर करो सारा संकट॥

जो भी तेरी आरती गावे, भक्ति भाव से ध्यान लगावे।
मनवांछित फल पावे माँ, सुख-समृद्धि घर आवे॥

माँ बगलामुखी की आरती, जो कोई नर गाता।
शत्रु नाश होय उसका, जीवन सुखमय हो जाता॥

॥ बोलो बगलामुखी माता की जय ॥ जय माँ पीताम्बरा ॥

श्री बगलामुखी स्तोत्रम् (21 श्लोक)

नित्य पाठ से वाक्सिद्धि, शत्रु-स्तम्भन एवं विजय प्राप्ति

॥ अथ श्री बगलामुखी स्तोत्रम् ॥

ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा ॥

१. बगलामुखीति विख्याता सर्वशत्रु-विनाशिनी । पीताम्बरा महादेवी सर्वकाम-फलप्रदा ॥

२. स्वर्णसिंहासनासीनां पीतवस्त्र-विभूषिताम् । गदा-हस्तां त्रिनेत्रां च ध्यायेद् देवीं सुपीवराम् ॥

३. दानव-मद-मर्दिनीं त्वां शत्रु-स्तम्भ-कारिणीम् । सर्वदुष्ट-प्रदुष्टानां स्तम्भिनीं विश्व-मोहिनीम् ॥

४. पीत-चन्दन-लिप्ताङ्गीं पीत-माल्य-विभूषिताम् । पीत-गन्धानुलिप्ताङ्गीं पीत-भूषण-भूषिताम् ॥

५. खड्ग-खर्पर-हस्तां च त्रिशूल-वरधारिणीम् । महा-भीमां महा-रौद्रां महा-दुष्ट-निवारिणीम् ॥

६. शत्रु-वाक्-स्तम्भिनीं देवीं शत्रु-बुद्धि-विनाशिनीम् । शत्रु-कार्य-विनाशिनीं त्वां नमामि महेश्वरीम् ॥

७. यः पठेत् स्तवमिमं नित्यं शत्रु-स्तम्भन-कारकम् । सर्व-शत्रु-विनाशः स्यात् सर्व-सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥

॥ फलश्रुति ॥ इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन् नित्यं स सिद्धिं लभते ध्रुवम् ॥